Posts

Showing posts with the label Habibullah Faizi
ADVERTISEMENT

आ गए हुज़ूर आ गए / Aa Gaye Huzoor Aa Gaye

जश्न-ए-'ईद-ए-बारहवीं मना आ गए हुज़ूर आ गए गूँज उठी सदा-ए-मरहबा आ गए हुज़ूर आ गए 'अर्श-ओ-फ़र्श की थी गुफ़्तुगू मैं बड़ा हूँ या बड़ा है तू फ़र्श बोला अब हूँ मैं बड़ा आ गए हुज़ूर आ गए जश्न-ए-'ईद-ए-बारहवीं मना आ गए हुज़ूर आ गए गूँज उठी सदा-ए-मरहबा आ गए हुज़ूर आ गए बकरी बोली हम भी शेर हैं या'नी आज से दिलेर हैं दौर-ए-क़त्ल-ओ-ख़ून लद गया आ गए हुज़ूर आ गए जश्न-ए-'ईद-ए-बारहवीं मना आ गए हुज़ूर आ गए गूँज उठी सदा-ए-मरहबा आ गए हुज़ूर आ गए मारी जा चुकी हो, बेटियो ! अब वक़ार-ओ-फ़ख़्र से जियो कट चुका है पंजा-ए-जफ़ा आ गए हुज़ूर आ गए जश्न-ए-'ईद-ए-बारहवीं मना आ गए हुज़ूर आ गए गूँज उठी सदा-ए-मरहबा आ गए हुज़ूर आ गए थरथराने, काँपने लगा चीख़ उठे पुजारी, क्या हुआ ? बुत ये कहते सज्दे में गिरा आ गए हुज़ूर आ गए जश्न-ए-'ईद-ए-बारहवीं मना आ गए हुज़ूर आ गए गूँज उठी सदा-ए-मरहबा आ गए हुज़ूर आ गए शायर: हबीबुल्लाह फ़ैज़ी ना'त-ख़्वाँ: हबीबुल्लाह फ़ैज़ी क़ारी रियाज़ुद्दीन अशरफ़ी jashn-e-'eid-e-baarahwi.n mana aa gae huzoor aa gae goonj uThi sada-e-marhaba aa gae huz...

मिल गया मुझ को शर्फ़े-हुज़ूरी अगर / Mil Gaya Mujh Ko Sharf e Huzoori Agar

मिल गया मुझ को शर्फ़े-हुज़ूरी अगर मैं कहूं क्या क्या सर पर उठा लाऊंगा आईना दिल का ले कर के जाऊंगा मैं और मदीने का मन्ज़र उठा लाऊंगा करबला में ये बादल ने आ कर कहा ए हुसैन ! ए शहंशाहे-सब्रो-रज़ा आप आक़ा हैं इर्शाद फ़रमाइये बूँद क्या मैं समुन्दर उठा लाऊंगा अपने जैसा वो कहता है सरकार को शर्म आती नहीं नजदी ग़द्दार को पहले चेहरा मिला लेना ऐ नजदिया सामने तेरे बन्दर उठा लाऊंगा जाने क्यूं उस नबी पर न क़ुर्बान हो जिन का रेहमत में डूबा ये फरमान हो होगी जिस जिस जगह प्यासी उम्मत मेरी मैं वहीँ हौज़े-क़ौसर उठा लाऊंगा शायर: हबीबुल्लाह फ़ैज़ी नातख्वां: हबीबुल्लाह फ़ैज़ी

चमकने लगा सुन्नियत का सितारा, बरेली में अहमद रज़ा जब से आये / Chamakne Laga Sunniyat Ka Sitaara, Bareli Me Ahmad Raza Jab Se Aaye

चमकने लगा सुन्नियत का सितारा, बरेली में अहमद रज़ा जब से आये हुवा सर्द फ़ितनों का हर इक शरारा, बरेली में अहमद रज़ा जब से आये उधर कुफ्र की सारी तन्ज़ीमे शामिल, इधर अहले-सुन्नत अकेले मुक़ाबिल मगर सुन्नियों ने ही मैदान मारा, बरेली में अहमद रज़ा जब से आये चमकने लगा सुन्नियत का सितारा, बरेली में अहमद रज़ा जब से आये हुवा सर्द फ़ितनों का हर इक शरारा, बरेली में अहमद रज़ा जब से आये गो उर्दू में पहले भी थी नात-गोई, मगर काबिले-तज़्किरा थी न कोई फलक छू गया शायरी का मिनारा, बरेली में अहमद रज़ा जब से आये चमकने लगा सुन्नियत का सितारा, बरेली में अहमद रज़ा जब से आये हुवा सर्द फ़ितनों का हर इक शरारा, बरेली में अहमद रज़ा जब से आये फ़तावे में इतनी हदीसें सजाई, के जिस पे करे फ़ख्र रूहे-बुखारी बरेली बना सुन्नियों का बुखारा, बरेली में अहमद रज़ा जब से आये चमकने लगा सुन्नियत का सितारा, बरेली में अहमद रज़ा जब से आये हुवा सर्द फ़ितनों का हर इक शरारा, बरेली में अहमद रज़ा जब से आये बहुत ही मुनज़्ज़म थे नजदी-वहाबी, थी हरसु ख़राबी ख़राबी ख़राबी हुवा इत्तेहाद उसका कुल पारा-पारा, बरेली में अहमद रज़ा जब से आये चमकने लगा ...

आँखों में नूर आ गया है, जिस ने मदीना देखा है / Aankhon Mein Noor Aa Gaya Hai, Jis Ne Madina Dekha Hai

आँखों में नूर आ गया है जिस ने मदीना देखा है अर्श का ज़ीना नज़र आ गया जिस को मदीना नज़र आ गया दिल में सुरूर आ गया है जिस ने मदीना देखा है आँखों में नूर आ गया है जिस ने मदीना देखा है का'बा देखा तो चलो गुम्बदे-ख़ज़रा देखो जिन की मर्ज़ी से हरम बन गया क़िब्ला देखो है शिफ़ाख़ाना-ए-रेहमत में दवा बख्शीश की तुम को 'जाऊका' बुलाता है मदीना देखो मुक़द्दर वो चमका गया है जिस ने मदीना देखा है आँखों में नूर आ गया है जिस ने मदीना देखा है गुल भी देखे हो अनादिल भी बहुत देखे हो चहचहाता है यहाँ बुलबुले-सिदरा देखो बन गए आक़ा, यहाँ जिस ने गुलामी मांगी है तलब क़तरे की, मिल जाता है दरिया देखो सब कुछ उसे मिल गया है जिस ने मदीना देखा है आँखों में नूर आ गया है जिस ने मदीना देखा है मांगी जाएगी जभी माँ की सनद महशर में मैं तो रज़वी हूँ ये कह दूंगा कि शजरा देखो रम्ज़ 'ला उक्सि़मु' आएगा समझ में फ़ैज़ी आला हज़रत की निगाहो से मदीना देखो अहमद रज़ा ने कहा है जिस ने मदीना देखा है आँखों में नूर आ गया है जिस ने मदीना देखा है शायर; हबीबुल्लाह फ़ैज़ी

होगा एक जलसा हश्र में ऐसा / Hoga Ek Jalsa Hashr Mein Aisa

होगा एक जलसा हश्र में ऐसा जिस में सरकार की अज़मत पे ख़िताबत होगी सदरे-महशर हमारा रब होगा हज़रते-बुलबुले-सिदरा की नक़ाबत होगी होगा सर मुस्तफ़ा का सजदे में जब परेशानी के आलम में ये उम्मत होगी रब कहेगा ये मेरा वादा है उसको बख़्शूंगा तेरी जिस में मुहब्बत होगी मैं पढूंगा हदाइक़े-बख़्शिश हश्र की भीड़ में गर मुझ को इजाज़त होगी सुन के नारा लगाएंगे सुन्नी और वहाबी के लिये दोहरी क़यामत होगी ये वसीयत है एक आशिक़ की कद की मिक़्दार में गहरी मेरी तुर्बत होगी उठ सकू मैं पए-अदब फ़ौरन जिस गड़ी क़बर में आक़ा की ज़ियारत होगी आ'ला हज़रत वहाँ पे जाएंगे जिस जगह उनके ग़ुलामों को ज़रुरत होगी तू है एक रज़वी नातख्वां  फ़ैज़ी इस लिये तेरे मुक़द्दर में भी जन्नत होगी शायर: हबीबुल्लाह फ़ैज़ी नातख्वां: हबीबुल्लाह फ़ैज़ी